September 29, 2005

पहेली



जिंदगी हर पल नए सवाल खडा करती है. . . .

सवालों में हर बार इक पहेली हुआ करती है. . . .

कब तक इन पहेलियों में जकडता जाऊंगा मैं.....

कब तक अपने विचारों से लडता रहूंगा मैं.....

पता नहीं पर....

अन्‍त की तलाश में शायद खुद मैं एक पहेली बन गया हूं।

3 comments:

Anonymous said...

हिन्दी लिखना भुल गये क्या ?

अनुनाद सिंह said...

बहुत अच्छी कविता है , भाव-सौन्दर्य से परिपूर्ण ।

पर देवनागरी में लिखिये तो इसका आकर्षण और बढ जाये ।

Cinders said...

Are you and your famuly OK? We here in America are mostly hearing about how bad the earthquake was in Pakastan, but that India was hit too. Please let me know your status.

Fond Regards - Cinders