August 09, 2005

मैं कमजोर नहीं हूं।


अधेरों की महफिल में, एक लम्‍बी कतार में,
खडा हूं अकेला हाथ में दिया लेकर।
लौ बुझ रही है पवन चल रही है,
हाथों की आ॓ट ने संभाल रखा है लौ को।
पर क्‍या अगर लौ बुझ जाये, पर क्‍या अगर अंधेरा हो जाये।
एक लौ ऑर भी है जो कभी नहीं बुझती।
मेरे अंदर की लौ जो मुझसे हमेशा यही कहती रहती है।
मैं कमजोर नहीं हूं। मैं कमजोर नहीं हूं।


जीवन की इन विषम परिस्‍थतियों में,
कुछ नया करने की चाह में,
मुझे आंधियों से भी टकराना होगा, तूफानों से भी लडना होगा।
शायद बहुत मुिश्‍कल है पर नामुिम्‍कन नहीं।
क्‍योंकि.......
मैं कमजोर नहीं हूं। मैं कमजोर नहीं हूं।

आज मेरी लेखनी नहीं थमेगी,
कागजों से इसकी स्‍याही नहीं मिटेगी।
अब भीड से आगे चलना है,
शायद इसी भीड का लीडर बनना है।
क्‍योंकि.....
मैं कमजोर नहीं हूं। मैं कमजोर नहीं हूं।


समय के बदलाव ने कमजोर बना दिया है।
रिश्‍तों की बनावट ने खोखला कर दिया है।
खोज रहा हूं खुद को खुद में, शायद आइना भी टूट चुका है.....पर
जो सपना मैंने देखा है, वो मेरे साथ है।
खुद ही जोडूंगा, इस टूटे हुये आइने को।
क्‍योंकि.....
मैं कमजोर नहीं हूं। मैं कमजोर नहीं हूं।

1 comment:

Rajat said...

bahut achchi kavita hai....naisargik gati hai.....bahut achchi.....